लेख-निबंध >> औरत का कोई देश नहीं औरत का कोई देश नहींतसलीमा नसरीन
|
7 पाठकों को प्रिय 150 पाठक हैं |
औरत का कोई देश नहीं होता। देश का अर्थ अगर सुरक्षा है, देश का अर्थ अगर आज़ादी है तो निश्चित रूप से औरत का कोई देश नहीं होता।...
वधू-निर्यातन कानून के प्रयोग में औरत क्यों है दुविधाग्रस्त?
भास्कर चट्टोपाध्याय, रुद्रनील घोष, संजय मुखोपाध्याय, कृष्णकिशोर भट्टाचार्य, सुमन भट्टाचार्य-ये सभी लोग कला-संस्कृति से जुड़े हुए हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ये लोग सामाजिक प्राणी नहीं हैं। ये लोग पुरुष-शासित समाज के पुरुष हैं। ये पुरुष गाना गाते हैं, कविता लिखते हैं, वाद्य बजाते हैं, अभिनय करते हैं-यानी कला-साहित्य की चर्चा करते हैं। धारणा यह है कि ये सभी पुरुष, इन्सान के तौर पर काफ़ी उन्नत हैं। ये लोग मानवता और मानवाधिकार में विश्वास करते हैं, औरत की आज़ादी की हिमायत करते हैं। सच तो यह है कि यह हक़ीकत सौ प्रतिशत ग़लत है। कला-साहित्य से बाहर के लोगों में जिस परिमाण में भला और बुरा शामिल है, भीतरी लोगों में भी उस परिमाण में मौजूद है। मुमकिन है कि गाँव-देहात का कोई किसान औरत-मर्द की आज़ादी में विश्वास करता हो और कोई मशहूर हीरो इस हक़ीकत में रत्ती भर भी विश्वास न करता हो। शिक्षित और अशिक्षित लोगों में भी नारी-निर्यातन के सवाल पर कोई दो राय नहीं है, बल्कि देखा यह जाता है कि शिक्षित लोगों में पुरुष-प्रधान मानसिकता अधिक है। इसकी वजह है शिक्षित लोग तन्त्र-मन्त्र भली भाँति सीख सकते हैं, नियम-कानून, पुरुषतन्त्र का शब्द-शब्द, बेहद त्रुटिहीन तरीके से सीख सकते हैं। अशिक्षित लोगों के लिए इतना सब सीखना सम्भव नहीं होता।
वे सभी पुरुष जो किसान या मज़दूर या छोटे-बड़े, नौकरी-पेशा, कारोबारी हों या वकील, जज, डॉक्टर, इन्जीनियर, वैज्ञानिक, उद्योगपति, कलाकार, साहित्यकार, या कुछ और हों, भले वह धनी या दरिद्र हों, शिक्षित या अशिक्षित हों-देखा गया है कि ये लोग नारी-निर्यातन में लगभग इसी तरह सिद्धहस्त हैं। जिसके पास, जितना भी धन हो लेकिन सभी एक ही समाज में निवास करते हैं और वह समाज पुरुषप्रधान है, जो समाज पुरुषों के नियम-मुताबिक, पुरुषों के आधिपत्य में, पुरुषों की वंशवृद्धि के लिए चलता है। पढ़े-लिखे लोग कुछ कम निर्यातन नहीं करते। यह सोचना भी सही नहीं है कि पढ़ा-लिखा होने से ही औरत को इन्सान होने का सम्मान देंगे। वर्तमान शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय में लड़के-लड़कियों को जो शिक्षा दी जा रही है, उससे पुरुषतन्त्र का कोई विरोध नहीं है। हमारे स्कूलों के लड़के-लड़कियाँ किसी भी किताब में पुरुषतन्त्र के खिलाफ़ कुछ भी नहीं पढ़ते। पाठ्य-पुस्तकों में औरत के समानाधिकार के पक्ष में किसी तरह के ज्ञान-वितरण का प्रबन्ध नहीं है। हमारी प्रचलित शिक्षा विद्यार्थियों को पुरुषतान्त्रिक मानसिकता के साथ बड़े होने में हर तरह से मदद करती है। शिशु घर-बाहर नज़र डालते हैं और देख-देख कर सीख-समझ लेते हैं कि औरत की जगह घर में है। औरत का काम है-गृहस्थी चलाना, बच्चे पालना, बच्चों की देखभाल करना, पति की सेवा करना और पुरुष का निवास है-विशाल, विस्तृत बाहरी दुनिया, विद्या, विज्ञान, वैभव, विप्लव, विद्रोह, विद्वेष, विजय के क्षेत्र में वही मौजूद है। औरत चाहे विदुषी हो या अनपढ़, अमीर हो दरिद्र, भले वह शहर में रहती हो या गाँव में, पुरुष शासित समाज की नारी-विरोधी संस्कृति के सामने वह असहाय है।
|
- इतनी-सी बात मेरी !
- पुरुष के लिए जो ‘अधिकार’ नारी के लिए ‘दायित्व’
- बंगाली पुरुष
- नारी शरीर
- सुन्दरी
- मैं कान लगाये रहती हूँ
- मेरा गर्व, मैं स्वेच्छाचारी
- बंगाली नारी : कल और आज
- मेरे प्रेमी
- अब दबे-ढँके कुछ भी नहीं...
- असभ्यता
- मंगल कामना
- लम्बे अरसे बाद अच्छा क़ानून
- महाश्वेता, मेधा, ममता : महाजगत की महामानवी
- असम्भव तेज और दृढ़ता
- औरत ग़ुस्सा हों, नाराज़ हों
- एक पुरुष से और एक पुरुष, नारी समस्या का यही है समाधान
- दिमाग में प्रॉब्लम न हो, तो हर औरत नारीवादी हो जाये
- आख़िरकार हार जाना पड़ा
- औरत को नोच-खसोट कर मर्द जताते हैं ‘प्यार’
- सोनार बांग्ला की सेना औरतों के दुर्दिन
- लड़कियाँ लड़का बन जायें... कहीं कोई लड़की न रहे...
- तलाक़ न होने की वजह से ही व्यभिचार...
- औरत अपने अत्याचारी-व्याभिचारी पति को तलाक क्यों नहीं दे देती?
- औरत और कब तक पुरुष जात को गोद-काँख में ले कर अमानुष बनायेगी?
- पुरुष क्या ज़रा भी औरत के प्यार लायक़ है?
- समकामी लोगों की आड़ में छिपा कर प्रगतिशील होना असम्भव
- मेरी माँ-बहनों की पीड़ा में रँगी इक्कीस फ़रवरी
- सनेरा जैसी औरत चाहिए, है कहीं?
- ३६५ दिन में ३६४ दिन पुरुष-दिवस और एक दिन नारी-दिवस
- रोज़मर्रा की छुट-पुट बातें
- औरत = शरीर
- भारतवर्ष में बच रहेंगे सिर्फ़ पुरुष
- कट्टरपन्थियों का कोई क़सूर नहीं
- जनता की सुरक्षा का इन्तज़ाम हो, तभी नारी सुरक्षित रहेगी...
- औरत अपना अपमान कहीं क़बूल न कर ले...
- औरत क़ब बनेगी ख़ुद अपना परिचय?
- दोषी कौन? पुरुष या पुरुष-तन्त्र?
- वधू-निर्यातन क़ानून के प्रयोग में औरत क्यों है दुविधाग्रस्त?
- काश, इसके पीछे राजनीति न होती
- आत्मघाती नारी
- पुरुष की पत्नी या प्रेमिका होने के अलावा औरत की कोई भूमिका नहीं है
- इन्सान अब इन्सान नहीं रहा...
- नाम में बहुत कुछ आता-जाता है
- लिंग-निरपेक्ष बांग्ला भाषा की ज़रूरत
- शांखा-सिन्दूर कथा
- धार्मिक कट्टरवाद रहे और नारी अधिकार भी रहे—यह सम्भव नहीं